कवि का संकल्प

 

घात के प्रतिघात के फण पर सदा चलता रहूंगा

किन्तु फिर भी लोक को आलोक से भरता रहूंगा

मृत्युंजयी हूँ है मुझे अमरत्व का वरदान शाश्वत
युग युगांतर तक बनेंगे अमर मेरे गान शाश्वत
एक अंतर्द्वंद्व शेष है जो कह न पाया
मनुज काया का अभी कर गूढ़ता भेदन न पाया
यह अनिश्चित प्रश्नवाचक चिह्न सी कब से खड़ी है
निःसारता ही सार इसका भेद यह मैं जानता हूँ

किन्तु मैं तो साधना की वह्नि में तपता रहूंगा
किन्तु फिर भी लोक को आलोक से भरता रहूंगा

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