ताशकंद समझौते पर


(ताशकंद समझौते के उपरान्त तत्कालीन प्रधानमंत्री

लालबहादुर शास्त्री की मन:स्थिति)

उस संधि-पत्र पर हस्ताक्षर, जब जन-नेता ने कर डाला ।
पावन स्वदेश का पलभर में, उसने इतिहास बदल डाला ।।
वह सहमा-सहमा ठगा-ठगा, ताकने निशा में लगा गगन ।
स्मरण शहीदों का आया, जल उठा लाल का अंतर्मन ।।

जो लहू बहा सीमाओं पर, उनको अब कौन सुमन दूँगा ?
उनकी पत्नी मॉ बहनों को, बोलो क्या आश्वासन दूँगा ?
दूँगा जवाब क्या भारत को, निरवता में ही बोल उठा ।
सीमा की शोणित बूँदों से, उस संधि पत्र को तोल उठा ।।

उलझन के इस चौराहे पर, पीड़ा बढ़ती ही जाती थी ।
हाँ ! चुपके-चुपके द्रत गति से यह उमर सरकती जाती थी ।।
यह अत्याकस्मिक पदाघात, केवल सन्नाटे ने देखा ।
रवि की किरणों ने ताशकंद में उसकी अर्थी को देखा ।।

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