ओ इंकलाब की अभिनव लय

 


ओ चिर अतृप्त चिर विद्रोही, ओ इंकलाब की अभिनव लय।
वैराग्य-त्याग की विमल मूर्ति, जन-पथ के राही चिर निर्भय।।

तुम प्रकटे एक बिम्ब बनकर, इस राजनीति के अम्बर में,
दाहक उत्तम सृजनधर्मी, बस क्रान्ति-राग था हर स्वर में।
अंगारों से खेले हर दम, आजीवन पीते रहे गरल,
शिव स्वयं चकित हो गए देख, कैसी जड़-चेतन में हलचल।
ले एक हाथ में गरल, एक में अमृत, पिया बारी-बारी,
युग बोल उठा यह क्या? यह क्या? किस महाक्रान्ति की तैयारी?
हे आदर्शों के अभय सेतु, बन गए राम के अनुयायी,
जीवन भर औघड़ रूप रहे, हे वैरागी ! हे विषपायी।
अपने असीम श्रद्धाबल से, हे दृढ़ी। बन गए मृत्युंजय।
ओ चिर अतृप्त चिर विद्रोही..............

दोनों कर में अंगार लिए, अन्तर में लेकर सृजन आग,
अलमस्त फकीरी जीवन था, आरत जन के भैरवी राग।
हे अभिनव विश्वामित्र, नहीं उपमान तुम्हारा मिल सकता,
कितनी पीड़ा थी संस्कृति की, कोई अनुमान नहीं सकता।
शोषित जन की तुम थे पुकार, दालितों के युग आदर्श बने,
अपने प्रचण्ड मेधा बल से तुम सचमुच भारतवर्ष बने,
तुमको लखकर आभास हुआ, चाणक्य स्वयं अवतरित हुए,
हे यशी तुम्हारी हुंकृति से सब दैन्य भाव भी क्षरित हुए,
कामना यही है सिंहपूत ! आदर्श तुम्हारे हो अक्षय
ओ चिर अतृप्त चिर विद्रोही.................

भगवान राम भी जिस भू पर, वनवास काल में आए थे,
उस तीर्थ शिरोमणि चित्रकूट में, तेरह वर्ष बिताये थे।
जिसकी गोदी में दर्शन पा, तुलसी ने की मानस रचना,
वह चित्रकूट तेरे प्रयत्न से, फिर श्रद्धा का सेतु बना।।
रामायण मेला करने की, थी भव्य योजना बनवाई,
एशिया नहीं, पूरा भूमंडल जुटे, यह कोई जान नहीं सकता,
गहराई सागर सी असीम्, कोई अनुमान नहीं सकता।
हे, राष्ट्रवाद की ऋचा मुखर, संकल्प सिद्ध तुम थे अजेय,
ओ चिर अतृप्त चिर विद्रोही..............

तुम मातृशक्ति के पूजक थे, निज संस्कृति के आराधक थे।
मानव के सही उपासक थे, शुचि विश्व-भाव के साधक थे।
तुम दलितों के उत्थान हेतु, मानवी-श्लोक के वाचक थे।
लेकिन अनीति की झंझा के, हे वज्र-वक्ष तुम बाधक थे।
हे चिर विराट ! हम वामन हैं, कैसे अर्चना तुम्हारी हो,
इस राजनगर के मýथल की, तुम सौरभमय फुलवारी हो।
इस समय-बालुका पर तुमने, पद चिन्ह किए शाश्वत अंकित।
उन पर ही चल कर पा सकता, यह राष्ट्र लक्ष्य अपना वांछित।
युग अम्बर के उदयाचल से, फिर से प्रकटो हे युगाधार।
हे आदर्शो से स्वर्णमेरू ! हे जन मंगल के स्वर्ण वलय।।
ओ चिर अतृप्त चिर विद्रोही..............

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