विजयादशमी
इसी दिन राम ने दस शीश रावण को सँहारा था
इसी दिन नाम ने आतंक से भू को उबारा था
अंधेरे की मिटी सत्ता उजाला मुस्कराया था
दनुजता पर मनुजता का विजय-ध्वज फरफराया था।
अवधपति राम की जय का बजा था लोक में डंका
ढही मीनार शोषण की मिली थी धूल में लंका
धरा की सभ्यता में एक नूतन मोड़ आया था
कि जनता की पुकारों पर जनार्दन दौड़ आया था ।
अभी तक लोक में दुर्धर्ष रावण की रही सत्ता
बिना जिसके इशारे के न हिलता एक था पत्ता
जहाँ में थी न हरियाली तबाही ही तबाही थी
मगर यह जुर्म कहने की जमाने में मनाही थी ।
धरा ही क्या गगन पाताल उससे थरथराते थे
वरुण, रवि, इन्द्र, शशि, यम तक पगों में सिर झुकाते थे
न उसकी कोई तुलना थी न उसकी कोई सानी थी
स्वयं लंकाधिपति के साथ जब दुर्गा भवानी थी ।
जिधर संकल्प रहता है उधर ही शक्ति रहती है
धनुष से शक्तिशाली के विजय की धार बहती है
अटल सिद्धांत है जग का न कोई काट सकता है
भुवन में शक्तिपूतों का नहीं अभियान रुकता है।
इसी बल से दशानन का विजय-रथ घनघनाता था
न कोई शूर रावण से कभी आँखें मिलाता था
हुआ संग्राम राघव का दशानन से भयंकर था
उधर था शक्ति का साधक इधर तो स्वयं ईश्वर था।
हुआ जब राम का पौरुष समर में व्यर्थ सारा था
तभी श्रीराम ने दुर्गा भवानी को पुकारा था
हुई थी शक्ति की पूजा हुआ था शक्ति-आवाहन
किया था राम ने संकल्प से देवी का आराधन ।
स्वयं भुवनेश ने भुवनेश्वरी से शक्ति पाई थी
विजय की दुन्दुभी रघुनाथ ने भव में बजाई थी
इसी दिन शक्ति का संकल्प रघुवर ने जगाया था
इसी दिन लोक शिखरों पर दिवाकर मुस्कराया था ।
इसी दिन आदमी ने एक नव-आधार पाया था
इसी दिन सुप्त पौरुष ने नया श्रृंगार पाया था
इसी दिन शक्ति पूजन का नया आदर्श मचला था
इसी दिन आदमी की जिन्दगी का पंथ बदला था ।
भुवन में मनुज की जय का लगा फिर गूँजने नारा
मनुज की शक्ति को लखकर चकित आकाश था सारा
तभी से शक्ति पूजन का मनुजता पाठ पढ़ती है
विजय-तिथि पर सदा अपना नया संकल्प गढ़ती है ।
अंधेरे की मिटी सत्ता उजाला मुस्कराया था
दनुजता पर मनुजता का विजय-ध्वज फरफराया था।
अवधपति राम की जय का बजा था लोक में डंका
ढही मीनार शोषण की मिली थी धूल में लंका
धरा की सभ्यता में एक नूतन मोड़ आया था
कि जनता की पुकारों पर जनार्दन दौड़ आया था ।
अभी तक लोक में दुर्धर्ष रावण की रही सत्ता
बिना जिसके इशारे के न हिलता एक था पत्ता
जहाँ में थी न हरियाली तबाही ही तबाही थी
मगर यह जुर्म कहने की जमाने में मनाही थी ।
धरा ही क्या गगन पाताल उससे थरथराते थे
वरुण, रवि, इन्द्र, शशि, यम तक पगों में सिर झुकाते थे
न उसकी कोई तुलना थी न उसकी कोई सानी थी
स्वयं लंकाधिपति के साथ जब दुर्गा भवानी थी ।
जिधर संकल्प रहता है उधर ही शक्ति रहती है
धनुष से शक्तिशाली के विजय की धार बहती है
अटल सिद्धांत है जग का न कोई काट सकता है
भुवन में शक्तिपूतों का नहीं अभियान रुकता है।
इसी बल से दशानन का विजय-रथ घनघनाता था
न कोई शूर रावण से कभी आँखें मिलाता था
हुआ संग्राम राघव का दशानन से भयंकर था
उधर था शक्ति का साधक इधर तो स्वयं ईश्वर था।
हुआ जब राम का पौरुष समर में व्यर्थ सारा था
तभी श्रीराम ने दुर्गा भवानी को पुकारा था
हुई थी शक्ति की पूजा हुआ था शक्ति-आवाहन
किया था राम ने संकल्प से देवी का आराधन ।
स्वयं भुवनेश ने भुवनेश्वरी से शक्ति पाई थी
विजय की दुन्दुभी रघुनाथ ने भव में बजाई थी
इसी दिन शक्ति का संकल्प रघुवर ने जगाया था
इसी दिन लोक शिखरों पर दिवाकर मुस्कराया था ।
इसी दिन आदमी ने एक नव-आधार पाया था
इसी दिन सुप्त पौरुष ने नया श्रृंगार पाया था
इसी दिन शक्ति पूजन का नया आदर्श मचला था
इसी दिन आदमी की जिन्दगी का पंथ बदला था ।
भुवन में मनुज की जय का लगा फिर गूँजने नारा
मनुज की शक्ति को लखकर चकित आकाश था सारा
तभी से शक्ति पूजन का मनुजता पाठ पढ़ती है
विजय-तिथि पर सदा अपना नया संकल्प गढ़ती है ।
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